कबीर के दोहे Kabir Ke Dohe

कबीर के दोहे Kabir Ke Dohe आज भी बहुत अधिक लोकप्रिय हैं। कबीर दास के दोहे वर्तमान समय में भी सभी लोगों के दिलों दिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। अभी की परिस्थितियों में भी संत कबीर के दोहे बहुत सटीक और सार्थक सिद्ध हो रहे है।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ।। 1 ।।
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ।। 2 ।।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ।। 3 ।।
तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।कबहुँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय ।। 4 ।।
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।। 5 ।।
सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में करते याद ।कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ।। 6 ।।
साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ।। 7 ।।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ।। 8 ।।
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ।। 9 ।।
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ।। 10 ।।
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।हीरा जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ।। 11 ।।
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय ।। 12 ।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।। 13 ।।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उडाय ।। 14 ।।
जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल ।तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसुल ।। 15 ।।
उठा बगुला प्रेम का तिनका, चढ़ा अकास ।तिनका तिनके से मिला, तिन का तिन के पास ।। 16 ।।
सात समंदर की मसि करौ, लेखनि सब बनराइ ।धरती सब कागद करौ, हरी गुण लिखा न जाइ ।। 17 ।।
साधू गाँठ न बांधई, उदर समाता लेय ।आगे पाछे हरी खड़े, जब माँगे तब देय ।। 18 ।।
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ।। 19 ।।
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ।। 20 ।।
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।। 21 ।।
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ।। 22 ।।
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ।। 23 ।।
गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच । 
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ।। 24 ।।
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ।। 25 ।।
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ।। 26 ।।
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जात जंजीर ।। 27 ।।
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ।। 28 ।।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।। 29 ।।
नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।और रसायन छांडि के, नाम रसायन लाग ।। 30 ।।
जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ।। 31 ।।
आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ।। 32 ।।
माँगन मरण सामान है, मति माँगो कोई भीख ।माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ।। 33 ।।
गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ।। 34 ।।
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